Saturday, August 5, 2023

मंदिर की सीड़ी

 हर वो जगह जहाँ हम ने माथा टेका, जहाँ पहुंचना ज़रूरी था, चाहे वो मंदिर हो या पाठशाला या कुछ और, किसी न किसी सीड़ी से सहारा तो लिया होगा | कोई ईंट होगी जिसने बोझ सहा होगा।किसी दीवार का सहारा ले कर खड़े हुए होंगे।  कोई रेलिंग पकड़ी होगी। यह कविता उस सीड़ी, उस दीवार उस रेलिंग के नाम। 


कीचड़ सने पैरो को भी
अपने माथे पे उठाती है
धन्य है मंदिर की सीड़ी जो 
ईश्वर मूरत तक पहुंचाती है

ईश्वर नमन कर के लौटो तो
उस सीढ़ी का भी सत्कार करो
उसके धैर्य की शक्ति है जो 
पूजन सम्पूर्ण  करवाती है
धन्य है मंदिर की सीड़ी जो 
ईश्वर मूरत तक पहुंचाती है



वो टूटे या खंडित ना हो  
इतना ही बस स्मरण रहे 
सीड़ी क्षीण हो टूट जाये तो 
राह कठिन हो जाती है
धन्य है मंदिर की सीड़ी जो 
ईश्वर मूरत तक पहुंचाती है

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