Monday, September 14, 2020

सुख चैन 


सुख बटोरते रहे थे कब से? याद नहीं 
पर अचानक ध्यान गया 
तो चैन कहीं गुम गया है 
किसी कोने में, जब सुख उठाने को 
दिन -रात से एक कर रहे थे 
नींद भूख भूली हुई थी 
अगले सुख का क़र्ज़ अदा कर रहे थे 
तब ही शायद मन से निकल के 
चैन कही चला गया 




सुख और चैन पकड़ के हाथ 
चलते रहे कई कदम साथ 
फिर सुख शायद कुछ डरने लगा 
"कल' को हासिल करने लगा 
चैन से आगे बढ़ने लगा 
और चैन का हाथ छूट गया 
शायद गुम गया, शायद रूठ गया 
चैन से जाने कब नाता टूट गया 

अब सुख के बिछौने पर लेटे तो 
नींद ज़िद्दी पलंग के दूसरी ओर रहती है 
नींद चैन की संगिनी 
सुर्ख़ रुआंसी आँखों से कहती है 
चैन ही जब नहीं तो 
सुख भला किस काम का?


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